हरी घास पीली दूबों परहरी घास पीली दूबों परआतुर-सी,बैठी हुईप्रतीक्षाएँआँखों में भरइन झरनों की गतिफूलों की महकऔर लंबे पठार-सी एक उदासी,भीगे-पलटूटे सपनों कीयादें बासी।कोई नहीं किसी गोधूली में आता बछड़े से मिलने कोजैसे आती गाएँएक नदी का बहनाअपने भीतर-बाहर,कितने-कितने प्रश्नअनुत्तरित कुछ छूटे से,सर से पाँवरहे आदमकदहम टूटे-से।हल्की-हल्की धूप शाम कीहोती-सी निर्वस्त्रपेट सेजैसी माँएँ।
हरी घास पर प्रेमप्रेम में तुम्हें चाहिए थाएकांत और सन्नाटा और असंभव सब कुछमुझे चाहिए था कोई प्राचीन चमत्कारप्रेम में तुम दौड़तीं हरी घास परमैं निहारता तुम्हें एकाग्र पुल पर चढ़करप्रेम में तुम धंसतीं मुझ मेंमैं धंसता तुम मेंजैसे कि एक नदी मिलती हैदूसरी नदी में संपूर्णशरीर मिलता है दूसरे शरीर मेंआत्मा दूसरी आत्मा में।
हरी घास पीली दूबों पर
ReplyDeleteहरी घास पीली दूबों पर
आतुर-सी,
बैठी हुई
प्रतीक्षाएँ
आँखों में भर
इन झरनों की गति
फूलों की महक
और लंबे पठार-सी एक उदासी,
भीगे-पल
टूटे सपनों की
यादें बासी।
कोई नहीं किसी गोधूली में आता
बछड़े से मिलने को
जैसे आती गाएँ
एक नदी का बहना
अपने भीतर-बाहर,
कितने-कितने प्रश्न
अनुत्तरित कुछ छूटे से,
सर से पाँव
रहे आदमकद
हम टूटे-से।
हल्की-हल्की धूप शाम की
होती-सी निर्वस्त्र
पेट से
जैसी माँएँ।
हरी घास पर प्रेम
ReplyDeleteप्रेम में तुम्हें चाहिए था
एकांत और सन्नाटा और असंभव सब कुछ
मुझे चाहिए था कोई प्राचीन चमत्कार
प्रेम में तुम दौड़तीं हरी घास पर
मैं निहारता तुम्हें एकाग्र
पुल पर चढ़कर
प्रेम में तुम धंसतीं मुझ में
मैं धंसता तुम में
जैसे कि एक नदी मिलती है
दूसरी नदी में संपूर्ण
शरीर मिलता है दूसरे शरीर में
आत्मा दूसरी आत्मा में।